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कोसी नदी अपडेट - पूर्णिया विधायक बासुदेव प्रसाद सिंह का आर्यावृत (पटना) को लिखा पत्र, 15 जुलाई 1965

  • By
  • Dr Dinesh kumar Mishra
  • April-20-2020

अच्छे दिन थे, जब विधायक समाचार पत्रों के माध्यम से भी जनता के बीच जाया करते थे। यह पत्र पूर्णिया के विधायक बासुदेव प्रसाद सिंह ने 15 जुलाई, 1965 को आर्यावृत-पटना में लिखा था.

संपादक-आर्यावृत, पटना के नाम पत्र, बरारी क्षेत्र में भीषण कटाव

महाशय,

गत नौ जुलाई से बारह जुलाई तक मैंने पूर्णिया जिले के बरारी प्रखंड के दक्षिणी और पश्चिमी हिस्से में पैदल, बैलगाड़ी और नाव द्वारा दौरा किया। मैंने पाया कि गोबराही दियारा गांव, जिसमें एक सौ उन्हत्तर परिवार हैं और जिसकी आबादी ग्यारह सौ है, दक्षिण तरफ गंगा नदी और पश्चिम तरफ कोसी नदी से घिर गया है। गंगा नदी से गांव चार सौ फुट की दूरी पर है और कोसी नदी से एक चौथाई मील की दूरी पर है। किसी भी समय यह गांव गंगा में विलीन हो सकता है। कटाव बहुत जोरों पर है।

जौनिया बालू टोला जिसमें उन्यासी परिवार हैं कोसी के गोद में चला गया। जौनिया और जितने टोले हैं, सभी खतरे में है। चंद दिनों में दो सौ पच्चीस परिवारों के घर कट जाने वाले हैं। करीब दो सौ पचास एकड़ जोत की जमीन फसल समेत कोसी में चली गई है। लोगों की स्थिति इस कटाव के कारण अत्यंत दयनीय हो गई है। एक तो अन्न संकट और दूसरे कटाव ने लोगों को भारी परेशानी और संकट में डाल दिया है। उन्हें तुरंत बसाने का प्रबंध होना चाहिए। इसके अतिरिक्त इन लोगों की रोजी के लिए भी व्यवस्था होनी चाहिए।

सरकारी बांध, जो चार मील लंबा है, नदी से सिर्फ आधा मील की दूरी पर है। जिस प्रकार अभी कटाव है उसे आशंका है कि यह बांध भी काफी खतरे में है। इस बांध के कट जाने से करीब पन्द्रह हजार लोगों का जीवन मुसीबतों में पड़ जाएगा। सरकार को चाहिए कि वह इस बांध को बचाने का प्रयत्न करे। कटाव क्षेत्र के अतिरिक्त मैंने दरबे, मोहम्मद हाशिमपुर, भरौली, जरलाही, मधेली, भकना, पकहरा, संतोषपुर, कुंजनगर, गुरमेला आदि गांवों को भी देखा। तमाम अस्सी प्रतिशत लोग भुखमरी की स्थिति में पाए गए। छोटे-छोटे किसानों एवं मजदूरों की स्थिति एक सी है। सरकार का यह आदेश है कि जमीन वालों को सस्ते गल्ले की दुकानों में अन्न नहीं मिलना चाहिए। इस आदेश में परिवर्तन हो और जिनके घरों में अन्न नहीं है उनको सस्ते गल्ले की दुकान से अन्न मिले।

दियारे की करीब दस हजार एकड़ जमीन जो आज चीना, धान मकई से भरी रहती थी, मैदान सी मालूम होती है। हाल में ही चीना की फसल लोगों ने बोई है। लगातार वर्षा होने के कारण सबकी स्थिति खराब ही है। ऐसा प्रतीत होता है कि फसल लगने से पहले ही वह पानी में बह जाएगी। इस प्रकार चाहे दियारा हो या भीठ की जमीन, सब की हालत एक सी ही है। अकाल जैसी स्थिति होती जा रही है।

सस्ते गल्ले की दुकान में अनाज की कमी है। उसमें काफी अन्न रहना चाहिए। मकई का भाव पच्चीस रुपये मन है। अगहनी धान का बीज लोगों को नहीं मिल रहा है। नीची जमीन में अगहनी धान की फसल लग गई है पर ऊपर की जमीन में धान रोपा ही नहीं गया था। रोपनी के समय जमीन में रोपने के लिए पानी है तो रोपने के लिए बीज ही तैयार नहीं है। लोगों को रोजी देने के लिए सरकार ने कठिन श्रम योजना लागू की थी परंतु बरसात के कारण योजना को सभी जगह जारी करना सम्भव नहीं हुआ। इसलिए बेरोजगारी और भी बढ़ गई है। भुखमरी की स्थिति बदतर होती जा रही है। पटुआ के साग से बहुत दिनों तक लोगों ने किसी तरह अपना काम चलाया। परंतु अब वह भी मयस्सर नहीं हो रहा है।

अतः सरकार से मेरा निवेदन है कि किसानों को ऋण चाहिए, बेरोजगारों को रोजी दी जाए, सस्ते गल्ले की दुकानों में अधिक अन्न भेजे जाए और कटाव पीड़ित लोगों को तुरंत बसाने का प्रबंध किया जाए।

बासुदेव प्रसाद सिंह
एम.एल.ए.
(15 जुलाई 1965)

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