कोसी नदी अपडेट - बिहार बाढ़, सुखाड़ और अकाल, वर्ष (1962), सुखदेव सहनी से हुयी बातचीत के अंश
ग्राम लदौरा, प्रखंड कल्याणपुर, जिला समस्तीपुर के सुखदेव सहनी से हुई मेरी बातचीत के कुछ अंश। उन्होंने कहा कि,
1962 में मैं सयाना हो गया था और मेरी शादी हो चुकी थी। बाल-बच्चे नहीं थे. बूढ़ी गंडक नदी हमारे गांव के बगल से बहती है। उस साल इस नदी का तटबंध एकदम सुबह में टूटा था। हल्ला हुआ तो हम लोग बाँध की तरफ दौड़े। मगर बाँध तो एकदम बेशऊर हो चुका था। एक छप्पर उठा कर हमने एक झोपड़ी के ऊपर रखना चाहा था तब तक पानी उसे बहा ले गया। यहाँ सरकार का एक चौकीदार रहा करता था और जब बांध टूट गया तो वह अपनी जान बचा कर भाग गया। बाँध को कोई नुकसान पहुंचेगा इसकी कोई आशंका नहीं थी। बाँध काफी ऊंचा और मजबूत था इसलिए हमलोग निश्चिन्त थे। बांध टूटने के पहले जो कुछ भी हुआ उसे उसी ने देखा होगा। हम लोग तो केवल अंदाजा लगा सकते थे।
प्रशासन आया दिन में दोपहर के आसपास और उनका सुझाव था कि पास में एक सेमल का पेड़ है उसे काट कर नदी में डाल दिया जाय तो उसकी धारा बदल जायेगी और गाँव बच जाएगा। जब यह किया गया तब नदी की धारा पश्चिम की ओर मुड़ गयी। धारा मुड़ने से जो गड्ढा बन गया था वह अभी भी है। हम लोग अपना-अपना परिवार ले कर गाछी में आ गये। अब पानी कहाँ जायेगा, इसका कोई ठिकाना नहीं था।
हमारा लदौरा गाँव 2200 बीघे का गाँव है और इतने ही टोले उसमें हैं। सरकार ने हाथ उठा दिया था कि वह तुरंत और कुछ नहीं कर सकती। बड़ी बर्बादी हुई थी और गाँव में महीने भर से ज्यादा पानी टिका रह गया था। गाँव के दो बच्चे इस बाढ़ में मारे गए थे।

रिलीफ हम लोगों को मिली, जिसमें ज़्यादातर जनेर दिया गया था। आजकल चावल मिलने लगा है भले ही उसकी गुणवत्ता कुछ भी न हो। बाद में खूंटा गाड़ कर उसमें बोर जमाये गए थे और पानी घटने पर बाँध की मरम्मत का काम शुरू किया गया था। वहाँ जो लोग काम करते थे उनसे हम लोग पूछते थे कि क्या आप लोग नदी की धारा को मोड़ने का काम कर रहे हैं? इस पर उनका जवाब होता था कि नदी की धारा को मोड़ना हमारा काम नहीं है, हम लोग बाँध जैसा था वैसा बना कर चले जायेंगे।
इस बाँध की वज़ह से हमारे गाँव की 165 बीघा ज़मीन नदी के उस पार चली गयी और हमारी समस्या अब यह है कि उस पार हम कैसे जायें। हमारी उस ज़मीन को उस पार के बाजितपुर, जितवारपुर प्रखंड, जिला समस्तीपुर के गाँव वाले जोत रहे हैं। बाँध जब बांधा गया था तब हमारा गाँव नदी से काफी दूर था पर पता नहीं क्यों यह तटबंध हमारे गाँव के बीचो-बीच से बनाया गया। अब डर लगता है कि अगर कभी बाँध टूट गया तो यहाँ रिंग बाँध बना दिया जायेगा और हमारा गाँव उसमें फँस जायेगा।
पुनर्वास तो मिला मगर सब को नहीं मिला। कुछ लोगों को जरूर मिला। 2004 की बाढ़ में भी हमारे गाँव का कुछ हिस्सा पानी में डूबा हुआ था और घर भी गिरे थे। इन घरों में से कुछ की मरम्मत और कुछ को नए सिरे से बनाने के लिए चुना गया था। उनमें से भी कुछ लोगों को यह सुविधा मिली और कुछ को नहीं मिली। इस बीच अधिकारी बदल गये जिसका मतलब था कि पूरी प्रक्रिया अब फिर नये सिरे से शुरू होगी। तब हम लोगों ने उम्मीद छोड़ दी। कहाँ तक उनके पीछे-पीछे घूमते?
1975 में यहाँ बगल के गाँव रामपुरा में बाँध टूटा था, जिसका असर हमारे गाँव पर भी पड़ा था मगर नुकसान कम हुआ था। जो भी नुकसान हुआ वह उधर ही हुआ। यहाँ सामने जो सड़क है उसे बाद में ऊंचा किया गया। यहाँ पश्चिम में एक दूसरी सड़क है जो बाँध तक जाती है उसे भी ऊंचा किया गया और तटबंध को तो ऊंचा किया ही गया। अब हम हर तरफ से पहले से ज्यादा दीवारों के बीच घिरे हैं। अब यहाँ बाढ़ आ तो सकती है मगर वह लौट कर जा नहीं सकती, वह यहीं रहेगी।
1987 में बागमती का पानी यहाँ आ कर बाँध से टिक गया और उसके साथ आयी रेत ने हमारे खेतों को तबाह किया। 2002 में भी यही हुआ और 2004 में जो हुआ उसे तो आप को बताया भी है। सभी लोगों ने इसी बाँध पर शरण ली थी. बाँध के अन्दर तब बूढ़ी गंडक थी और तटबंध के बाहर बागमती का पानी हिलोरें मार रहा था. सारे लोग अपने माल-मवेशी के साथ बाँध पर थे. इन बांधों ने हमको फंसाया और इन्हीं बांधों की वजह से बचे भी. क्या लीला है?
"यह लीला इस साल, 2020 में भी कभी भी हो सकती है।"
श्री सुखदेव सहनी

